
पहलगाम आतंकी हमले के बाद देश की राजनीति में एक दुर्लभ एकता देखने को मिली, जिसे मोदी सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत सभी दलों के नेताओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भेजकर आगे बढ़ाया। कांग्रेस नेता शशि थरूर को इनमें से एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सौंपा गया, जो उनकी वैश्विक छवि और अनुभव को मान्यता देने जैसा था। लेकिन कांग्रेस ने इसका स्वागत करने की बजाय, अपनी ओर से चार नेताओं की सूची जारी कर दी, जिसमें थरूर का नाम नहीं था, और फिर सरकार पर पक्षपात का आरोप लगाया।
कांग्रेस की यह प्रतिक्रिया उसके अंदरूनी मतभेदों को उजागर करती है और पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाती है। जहां DMK और NCP जैसे अन्य विपक्षी दलों ने इस पहल को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया, वहीं कांग्रेस बंटी और असहज नजर आई। इसी बीच वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने INDIA गठबंधन की कमजोरी पर टिप्पणी की, जिस पर पार्टी ने उन्हें सार्वजनिक रूप से फटकार भी लगाई।
शशि थरूर की सरकार की सराहना करने की आदत कांग्रेस को पहले से ही असहज करती रही है — चाहे वह मोदी सरकार हो या केरल की विजयन सरकार। पार्टी के संचार प्रमुख जयराम रमेश का यह कहना कि चारों नेता पार्टी का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे बल्कि अपनी “अंतरात्मा” की आवाज सुन रहे हैं, एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: तो कांग्रेस का ऑपरेशन सिंदूर पर आधिकारिक रुख क्या है?
कांग्रेस को चाहिए कि वह विशेष सत्र की मांग करने या अपनी सूची खारिज होने पर नाराज होने के बजाय यह स्पष्ट करे कि क्या वह सरकार का बिना शर्त समर्थन करती है, राहुल गांधी की आलोचना के साथ खड़ी है, या बीच का कोई रास्ता अपनाती है। थरूर से नाराज़ होकर या सरकार को दोषी ठहराकर यह जवाब नहीं मिल सकता।